अपने अधिकार ओर न्याय के लिए दर दर भटकता नागरिक। : ग्राम पंचायत से परेशान ग्रामीण
झकनावद ग्राम पंचायत में भ्रष्टाचार चरम पर: गरीब दुकानदार को मिला अन्याय, हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी नहीं मिला हक।
झाबुआ से चंद्रशेखर राठौर की खास रिपोर्ट
झाबुआ जिले की पेटलावाद जनपद पंचायत की ग्राम पंचायत झकनावद में भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही का ऐसा मामला सामने आया है जो न केवल मानवता को शर्मसार करता है बल्कि शासन-प्रशासन की संवेदनहीनता की पोल भी खोलता है।
यहाँ के निवासी रवि सेन, जो कि वर्षों से पंचायत भवन के समीप एक गुमटी में सैलून की दुकान चला रहे थे, अब दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। रवि सेन ने बताया की ग्राम पंचायत ने उनसे वादा किया था कि पक्की दुकान दी जाएगी, इसके एवज में ₹2.5 लाख की मांग की गई। भरोसे में आए इस गरीब ने ब्याज पर कर्ज लेकर पैसे पंचायत को दे दिए, लेकिन बाद में जब पंचायत ने नया कॉम्प्लेक्स बनाया तो उन्हें दुकान नहीं दी गई। पंचायत के कुछ सदस्यों ने आपस में ही दुकानों का बँटवारा कर लिया।
जब रवि सेन ने विरोध किया तो पंचायत सचिव ने लापरवाही से जवाब देते हुए कहा – "जाओ जहाँ शिकायत करनी है करो, मुझे कुछ नहीं पता।"
अब शिकायतों का दौर सुरु हुआ जिसमे नीचले अधिकारियो से लेकर उच्च अधिकारियो व उच्च न्यायालय तक की बाते हुई।
रवि सेन ने 181 पर कई बार शिकायत दर्ज कराई, लेकिन बिना किसी जांच के मामले को हर बार 'निराकृत' दिखाकर बंद कर दिया गया।
जनपद पंचायत पेटलावाद मे भी कई चक्कर काटे गये लेकिन एक हि आशवासन दिया गया की ऊपर वाले जो भी निर्णय लेंगे हम कार्यवाही करेंगे। सीईओ साहब का कहना था।
उस के बाद जिला जनसुनवाई पोर्टल और झाबुआ में कई बार आवेदन दिए गए, पर हर बार सिर्फ आश्वासन ही मिला। की मामले की जांच की प्रक्रिया चल रही है जैसे हि जांच हो जाति है आपको बता दिया जायेगा। जिला पंचायत सीईओ साहब का कहना था। ओर जिला कलेक्टर के समक्ष हर बार ये बाते सुनने को मिली।
अंत में न्याय की आस में उन्होंने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट उच्च न्यायालय इंदौर खंड पीट का दरवाज़ा खटखटाया।
हाईकोर्ट ने दिया न्याय, पर पंचायत और जनपद पंचायत टस से मस नहीं:
हाईकोर्ट ने रवि सेन के पक्ष में निर्णय देते हुए स्पष्ट आदेश दिया कि उन्हें उनकी दुकान दी जाए। बावजूद इसके, पंचायत सचिव और जनपद सीईओ ने कोर्ट के आदेश की भी अनदेखी कर दी।
अब सवाल उठता है:
क्या ग्राम पंचायतें कोर्ट से भी ऊपर हैं?
क्या “आत्मनिर्भर पंचायत” की परिकल्पना ऐसे ही अपारदर्शी और भ्रष्ट नेतृत्व के भरोसे साकार होगी?
राजनीतिक चुप्पी और प्रशासनिक मिलीभगत:
इस पूरे मामले पर न तो स्थानीय विधायक ने कुछ कहा, न ही भाजपा के किसी जिम्मेदार नेता ने संज्ञान लिया। सवाल ये भी है कि क्या आत्मनिर्भर भारत की बात करने वाले जनप्रतिनिधि गरीबों को आत्मनिर्भर बनने से रोकने में खुद सहभागी हैं?
रवि सेन की पुकार:
"मेरे पास अब कुछ नहीं बचा। दुकान भी नहीं, पैसे भी नहीं। सिर्फ ब्याज में डूबता जा रहा हूँ। क्या न्याय पाना अब सिर्फ अमीरों का अधिकार है?"
झकनावद जैसे गांवों में हो रहे इस तरह के भ्रष्टाचार से देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगते हैं। यदि शासन और न्यायालय के आदेशों की भी खुलेआम अवहेलना होती है, तो आम आदमी को न्याय कैसे मिलेगा?
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